Explainer: अछूत कौन थे? और उन्हें कैसे परिभाषित किया गया? कब हुई थी आखिरी जाति जनगणना,

Explainer: अछूत कौन थे? और उन्हें कैसे परिभाषित किया गया? कब हुई थी आखिरी जाति जनगणना,

भारत सरकार ने स्वतंत्रता के बाद पहली बार जाति आधारित जनगणना कराने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। यह जनगणना मुख्य जनगणना प्रक्रिया के साथ ही कराई जाएगी और इसके पूरा होने में लगभग एक वर्ष का समय लग सकता है। इस फैसले की घोषणा केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की राजनीतिक मामलों की समिति (सीसीपीए) की बैठक के बाद की।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और कांग्रेस की मांग

यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब कांग्रेस पार्टी और विपक्षी दल लंबे समय से जाति जनगणना की मांग कर रहे थे। राहुल गांधी ने कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 2011 में की गई जाति जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक करने की मांग की थी। साथ ही, उन्होंने आरक्षण की 50% सीमा हटाने की भी वकालत की थी। कांग्रेस का मानना है कि जाति आधारित जनगणना समाज में समान अवसरों को बढ़ावा देगी।

आरएसएस ने भी जताया था समर्थन

गौर करने वाली बात यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी जाति जनगणना का समर्थन किया है। हालांकि, आरएसएस ने यह साफ कहा था कि इस जनगणना का राजनीतिक या चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यह जनगणना सामाजिक न्याय और समावेशिता की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

1931 की आखिरी जाति जनगणना: ऐतिहासिक झलक

भारत में आखिरी बार जाति जनगणना 1931 में ब्रिटिश सरकार द्वारा कराई गई थी। इससे पहले 1901 में एक व्यापक जनगणना की गई थी। 1931 की जनगणना ने उस समय 4,147 जातियों की पहचान की थी। भारत की जनसंख्या उस समय लगभग 35 करोड़ थी (जिसमें आज के पाकिस्तान और बांग्लादेश भी शामिल थे)।

ओबीसी की भागीदारी और मंडल आयोग

1931 की जनगणना के अनुसार, भारत की कुल जनसंख्या में से लगभग 52 प्रतिशत लोग ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (OBC) में आते थे। यही आंकड़ा मंडल आयोग (1980) की सिफारिशों की नींव बना, जिसमें शिक्षा और नौकरियों में OBC को 27% आरक्षण देने की बात कही गई थी। यह आरक्षण 1990 में लागू किया गया।

धार्मिक और जातीय संरचना: एक बहुपरतीय समाज की झलक

1931 की जनगणना में धार्मिक संरचना कुछ इस प्रकार थी:

  • हिंदू: 68.36%
  • मुस्लिम: 22.16%
  • अन्य: ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध आदि

लेकिन केवल धर्म से तस्वीर स्पष्ट नहीं होती। जनगणना ने यह भी उजागर किया कि ईसाइयों और मुसलमानों के बीच भी जाति जैसी संरचनाएं मौजूद थीं। उदाहरण के लिए, बॉम्बे में कोली और गुजरात में कुनबी समुदायों की पहचान मिली, जो मिश्रित धार्मिक परंपराओं का पालन करते थे।

प्रांतवार प्रमुख जातियां

  • बंबई में कुनबी (मराठों समेत): 64 लाख
  • संयुक्त प्रांत में चमार: 63 लाख
  • बिहार-उड़ीसा में गोआला: 34 लाख
  • बंगाल में कैबार्टा: 27 लाख

पंजाब में कुछ बाहरी जातियों ने खुद को ‘आद धर्मी’ घोषित किया ताकि वे धार्मिक वर्गीकरण से बाहर रह सकें।

शिक्षा में भी दिखा जातीय अंतर

1931 की जनगणना में भारत की कुल साक्षरता दर 9.5% थी (5 वर्ष से अधिक आयु के लिए)। इसमें ब्राह्मणों की साक्षरता दर सबसे अधिक 27% थी।

  • पुरुष ब्राह्मण: 43.7%
  • महिला ब्राह्मण: 9.6%

हालांकि, यह दर उत्तर भारत में केवल 15% थी, जो राष्ट्रीय औसत से भी कम थी। इससे स्पष्ट होता है कि शिक्षा में क्षेत्रीय असमानताएं भी बड़ी भूमिका निभाती थीं।

केरल: शिक्षा में सबसे आगे

त्रावणकोर और कोचीन (आज का केरल) उस समय भी साक्षरता में अग्रणी थे। यहां की साक्षरता दर 25% से अधिक थी, जो रियासतों की प्रगतिशील नीतियों का परिणाम थी। यह आज के ‘केरल मॉडल’ की नींव मानी जाती है।

हाशिए पर खड़े समुदाय: ‘बाहरी वर्ग’ और भेदभाव

1931 की जनगणना में ‘अछूत’ और ‘बाहरी वर्ग’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जिनसे आज की अनुसूचित जातियों की पहचान बनी। यह वर्गीकरण न सिर्फ सामाजिक भेदभाव को उजागर करता था, बल्कि आरक्षण और सकारात्मक कार्रवाई की भावी नीतियों का आधार भी बना।

जनगणना में लगभग 68 जातियों को सामाजिक-राजनीतिक अक्षमताओं के आधार पर बहिष्कृत बताया गया। 1935 के भारत सरकार अधिनियम के तहत इन जातियों को विशेष दर्जा भी दिया गया।

जाति जनगणना: क्यों है यह अब जरूरी?

जाति आज भी भारत की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संरचना का अभिन्न हिस्सा है। यह किसी व्यक्ति के व्यवसाय, सामाजिक स्थान और वैवाहिक विकल्पों तक को प्रभावित करती है। इसलिए, जाति आधारित डेटा का होना नीतियों को अधिक प्रभावी और समावेशी बनाने में सहायक होगा।

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  • Aaj Ki Baat Desk

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