भारत में नारी को देवी का रूप माना गया, लेकिन व्यवहार में उसे हमेशा दूसरे दर्जे का नागरिक ही समझा गया। सदियों तक महिलाओं ने जो सहा — वो शब्दों से परे है। शादी होते ही बेटी से बहू बन जाने वाली लड़की को अपने ससुराल में अक्सर दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया, बेटी पैदा करने पर ताने मिले, औरत का मनोबल इस कदर तोड़ा गया कि वह या तो खुद को खत्म कर बैठी या चुपचाप जीती रही।
‘पति परमेश्वर’ की छवि इतनी गहराई से समाज में बैठा दी गई कि महिलाएं अपनी इच्छाओं, सपनों और आवाज़ तक को मारने लगीं। और पुरुष समाज ने इसे ‘परंपरा’ कहा, ‘सम्मान’ कहा — एक ‘आदर्श महिला’ की परिभाषा बना दी गई जो चुप रहे, सहन करे, और मुस्कुराती रहे।
लेकिन वक्त बदला
महिलाएं पढ़ने लगीं, काम करने लगीं, आत्मनिर्भर हुईं। उन्हें कानूनों का सहारा मिला, समाज के एक तबके की सहानुभूति भी मिली। और जब उन्होंने सवाल पूछने शुरू किए — तो पुरुष समाज चौंक गया।
यह वही समाज था जिसने वर्षों तक महिलाओं की पीड़ा को ‘घर की बात’ कहकर दबा दिया था। लेकिन जैसे ही कुछ महिलाओं के गलत कदम सामने आए — जैसे मुस्कान रस्तोगी और सोनम रघुवंशी के मामले — पूरा समाज हिल गया।
मेरठ की मुस्कान ने अपने पति सौरभ की हत्या करके उसे टुकड़ों में काटकर ड्रम में बंद कर दिया। वहीं मध्य प्रदेश की सोनम ने अपने पति राजा को हनीमून के दौरान मौत के घाट उतार दिया। इन घटनाओं ने सुर्खियां बटोरीं — और पुरुषों के दिल में डर भी।
“क्या मेरी पत्नी भी ऐसा कर सकती है?”
“अगर मैं रिश्ता खत्म करना चाहूं तो क्या वो मुझे फंसा सकती है?”
“क्या अब घर में भी सुरक्षित नहीं हूं?”
ऐसे सवाल अब पुरुषों के मन में आने लगे हैं। लेकिन ज़रा सोचिए — जब यही डर महिलाओं को सालों-साल महसूस होता रहा, तब किसी ने क्या किया?
जब दहेज के लिए बहुएं जलाई गईं — किसी ने पूछा क्या वो सुरक्षित हैं?
जब बार-बार बेटा न होने पर महिला को दोषी ठहराया गया — किसी ने सवाल किया क्या ये सही है?
जब घरेलू हिंसा को ‘परिवार का मामला’ कहकर नजरअंदाज़ किया गया — तब कितने पुरुषों ने आवाज़ उठाई?
आज के केस डरावने हैं, लेकिन क्या वे नए हैं?
हिंसा की जड़ें अगर गिनी जाएं, तो महिलाओं के हिस्से में असंख्य कहानियां आएंगी। मुस्कान और सोनम जैसे मामले बेहद गंभीर हैं और उनकी आलोचना भी जरूरी है — लेकिन उन्हें देखकर पूरे महिला समाज को कटघरे में खड़ा करना क्या उचित है?
क्या कुछ महिलाओं की क्रूरता के आधार पर अब हर पत्नी को शक की निगाह से देखना चाहिए?
औरत पीड़िता थी — ये सच था।
लेकिन औरत हमेशा पीड़िता रहे — ये झूठ है।
और मर्द हमेशा शोषक रहे — ये भी सच नहीं है।
अब वक्त है एक नई सोच की।
जहां नारी को अबला नहीं, बराबरी समझा जाए। और पुरुष को हमेशा दोषी नहीं, इंसान समझा जाए।
हमें यह स्वीकारना होगा कि कोई भी लिंग परिपूर्ण नहीं है। और कोई भी गुनाह, चाहे पुरुष करे या महिला, गुनाह ही होता है। लेकिन इसके साथ ही यह भी ज़रूरी है कि इतिहास को नज़रअंदाज़ न किया जाए।
जब महिलाएं हिंसा का शिकार थीं — तो उनकी चुप्पी पर ताले लगा दिए गए।
आज जब कोई महिला हिंसा कर रही है — तो पूरी नारी जाति को अपराधी बताया जा रहा है।
यह दृष्टिकोण भी असंतुलित है।
संतुलन यही है कि…
- न किसी को अंधी श्रद्धा दी जाए, न अंधा संदेह।
- न महिलाओं की पीड़ा को कमतर समझा जाए, न पुरुषों की तकलीफ को मजाक।
- न कानून का दुरुपयोग हो, न उसका डर समाज के किसी भी वर्ग को जीने से रोके।
सच्चा समाज वो नहीं जिसमें कोई ‘डरे’,
बल्कि वो जिसमें कोई ‘डराए’ नहीं।
आज हम ऐसे मोड़ पर हैं, जहां रिश्तों को दोबारा परिभाषित करने की जरूरत है।
जहां प्यार में बराबरी हो, कानून में संतुलन हो, और सोच में इंसानियत हो।
यह भी पढ़ें: Benefits of Green Tea: वजन घटाने में ग्रीन टी कितनी असरदार? जानिए इसके फायदे और सही सेवन का तरीका
The Ink Post Hindi: देश, राजनीति, टेक, बॉलीवुड, राष्ट्र, बिज़नेस, ज्योतिष, धर्म-कर्म, खेल, ऑटो से जुड़ी ख़बरों को पढ़ने के लिए हमारे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Linkedin, Facebook, X और Instagram पर फॉलो कीजिए. Aaj Ki Baat: Facebook | Instagram | LinkedIn





