Pakistan: भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने सिंधु जल समझौते को लेकर तनाव एक बार फिर सतह पर आ गया है. इस बार पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी के उग्र बयान ने दोनों देशों के रिश्तों में और तल्ख़ी घोल दी है. भारत के गृह मंत्री अमित शाह द्वारा यह साफ़ कहे जाने के बाद कि “अब सिंधु समझौते को बहाल करने का कोई सवाल नहीं है”, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया तीखी रही है.
“या तो समझौता मानो या जंग झेलो”
बिलावल भुट्टो ने एक सार्वजनिक रैली में भारत को दो टूक चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि अगर भारत सिंधु जल संधि को पूरी तरह रद्द करता है, तो पाकिस्तान को सभी छह नदियों पर नियंत्रण के लिए सैन्य कदम उठाना पड़ सकता है. भारत या तो समझौते के प्रावधानों को माने, या फिर पाकिस्तान से युद्ध के लिए तैयार रहे. बिलावल पहले भी इस मुद्दे पर उग्र टिप्पणियां कर चुके हैं, जिसमें उन्होंने कहा था .या तो नदियों में पानी बहेगा, या भारत की गलियों में खून.
पाकिस्तान का विरोध और अस्तित्व की दुहाई
बिलावल ने सिंधु जल विवाद को पाकिस्तान की “अस्तित्व की लड़ाई” बताते हुए कहा कि अगर भारत इस दिशा में कोई एकतरफा कदम उठाता है, तो इसे युद्ध की घोषणा माना जाएगा. साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि यदि पाकिस्तान का “हक” मारा गया, तो उसके पास कोई विकल्प नहीं बचेगा.
भारत का सख्त रुख: संधि बहाली से इनकार
गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में स्पष्ट किया कि भारत अब सिंधु जल संधि को दोबारा बहाल करने का इच्छुक नहीं है. उन्होंने इसे आतंकवाद के खिलाफ सख्ती से जोड़ते हुए कहा कि पाकिस्तान से रिश्तों में अब लचीलेपन की कोई गुंजाइश नहीं है. भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद इस वर्ष अप्रैल में संधि को निलंबित कर दिया था. अब गृह मंत्री की स्पष्ट घोषणा के बाद यह मामला एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गर्माया हुआ है.
क्या है इसका मूल स्वरूप?
1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुए सिंधु जल समझौते के तहत. सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का जल पाकिस्तान को दिया गया, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज का जल भारत के हिस्से में आया. इस समझौते का उद्देश्य था कि दोनों देश सीमित संसाधनों के बीच सहमति और शांति से जलवितरण करें. इसमें आपसी बातचीत, निरीक्षण और विवाद निवारण की प्रक्रिया भी तय की गई थी.
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