Donald Trump vs Harvard University: दोस्ती की आड़ में भारत से दुश्मनी निभा रहा अमेरिका?

Harvard University

Harvard University: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के साथ जारी बहस में एक नया कदम उठाया है. आंतरिक सुरक्षा विभाग (DHS) की सचिव क्रिस्टी नोएम द्वारा भेजे गए पत्र में विश्वविद्यालय के विदेशी छात्र और शैक्षणिक आदान-प्रदान कार्यक्रम का प्रमाणन तत्काल प्रभाव से रद्द करने का निर्णय सुनाया गया है. इस फैसले से न केवल भारत बल्कि दुनियाभर के हजारों छात्रों की पढ़ाई पर संकट मंडरा गया है.

क्या है Harvard University विवाद?

ट्रंप प्रशासन और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के बीच पहले से ही तनातनी चल रही है. सरकार ने आरोप लगाया है कि हार्वर्ड यहूदी छात्रों और प्रोफेसरों के प्रति भेदभाव को रोकने में विफल रहा, जबकि विश्वविद्यालय अकादमिक स्वतंत्रता और स्वायत्तता का रक्षण करता दिखता है. इस कड़वी बहस ने धीरे-धीरे विदेशी छात्रों के मुद्दे तक मोड़ ले लिया.

DHS का रद्दीकरण आदेश

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार क्रिस्टी नोएम ने हार्वर्ड को स्पष्ट रूप से लिखित संदेश में बताया, हार्वर्ड विश्वविद्यालय (Harvard University) के छात्र एवं शैक्षणिक आदान-प्रदान कार्यक्रम का प्रमाणन तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया गया है. इसका तात्पर्य यह है कि अब नए विदेशी छात्रों को एडवांस में दाखिला नहीं मिलेगा और वीज़ा प्रक्रिया भी अनिश्चित हो गई है.

भारतीय छात्रों की चुनौती

हर साल लगभग 500–800 भारतीय छात्र हार्वर्ड में दाखिला लेते हैं, और इस सत्र में 788 भारतीयों ने नाम लिखा था. अब उनमें से अधिकांश के सामने दो ही विकल्प बचे हैं: या तो किसी अन्य मान्यता प्राप्त अमेरिकी कॉलेज में स्थानांतरण कर लें, या फिर अमेरिका में अपने कानूनी दर्जे को खोकर देश छोड़ दें.

मौजूदा छात्रों को मिली राहत

DHS ने यह भी रेखांकित किया कि यह बदलाव केवल 2025–26 के अकादमिक वर्ष से लागू होगा. यानी जो विदेशी छात्र वर्तमान सेमेस्टर में पढ़ाई कर रहे हैं, वे अपना कोर्स बिना किसी बाधा के पूरा कर सकेंगे और स्नातक तक पहुँच जाएंगे.

आगे की संभावनाएंं

यह विवाद वैश्विक शिक्षा पर एक गहरा सवाल खड़ा करता है: क्या अमेरिका आने वाली प्रतिभा के स्वागत में और कड़ाई करेगा, या शैक्षणिक संस्थानों की स्वतंत्रता को प्राथमिकता देगा? आने वाले महीनों में इस फैसले के दायरे और छात्रों की судьत तय करेगी कि अमेरिका अपनी शीर्ष यूनिवर्सिटियों को अन्तरराष्ट्रीय मानकों पर कितना खुला रख पाता है.

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Author

  • Akash Singh

    पत्रकारिता के इस क्षेत्र में पांच सालों में काफी कुछ सीखने मिला. खबरों को सटीक और सरलता से समझने का हुनर. राजनीति करने का नहीं लिखने का शौक. निरंतर नई चीजें सीखने का प्रयास और उसपर अमल करना यह सिलसिला यूं ही आगे भी चलता रहेगा.

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