Muhammad yunus resignation: बांग्लादेश एक बार फिर गंभीर राजनीतिक अस्थिरता की चपेट में है. अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना के अचानक देश छोड़ने के बाद से हालात बेकाबू होते जा रहे हैं. अंतरिम सरकार की बागडोर नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के हाथों में है, लेकिन यह ज़िम्मेदारी अब उनके लिए एक कठिन परीक्षा बन चुकी है. राजनीतिक दलों में अविश्वास, सेना की बढ़ती दखलअंदाजी और तेजी से बदलते समीकरण, सभी ने मिलकर एक गंभीर संकट की स्थिति पैदा कर दी है.
राजनीतिक दलों को जोड़ने की चुनौती
यूनुस सरकार का सबसे विवादास्पद कदम अवामी लीग पर प्रतिबंध रहा है. शेख मुजीबुर रहमान की इस पार्टी को बैन करने से देश का बड़ा तबका असंतुष्ट है. दूसरी ओर, विपक्षी पार्टी बीएनपी को लग रहा है कि सत्ता उनके करीब है, लेकिन उन्हें डर है कि कोई नई ‘किंग्स पार्टी’ — जैसे कि नाहिद इस्लाम की NCP — सत्ता के लिए तैयार की जा रही है. यूनुस के लिए जरूरी है कि सर्वदलीय संवाद और विश्वास बहाली के प्रयास तेज़ किए जाएं ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बचाया जा सके.
चुनाव पर असहमति बनी बड़ी बाधा
यूनुस जहां 2026 में चुनाव करवाने की बात कर रहे हैं, वहीं सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज़-ज़मां का दबाव है कि जल्द चुनाव कराए जाएं. यह खींचतान देश की स्थिरता को कमजोर कर रही है. अगर यूनुस दिसंबर 2025 तक चुनाव कराने का संकेत दें, तो यह सेना और अंतरराष्ट्रीय समुदाय — दोनों को संतुष्ट कर सकता है.
सेना के भीतर बढ़ती फूट को कैसे संभालें?
सेना में इस वक्त दो धड़े बन चुके हैं — एक भारत समर्थक जनरल ज़मां का और दूसरा पाकिस्तान समर्थक लेफ्टिनेंट जनरल फैज़ुर रहमान का. अगर यूनुस ने संतुलन नहीं साधा और किसी एक गुट का समर्थन लिया, तो तख्तापलट की संभावना और प्रबल हो सकती है.
क्या यूनुस बचा पाएंगे लोकतंत्र?
राष्ट्रपति के बयान और कट्टरपंथियों की सक्रियता संकेत देते हैं कि मोहम्मद यूनुस के पास ज्यादा समय नहीं है. अगर उन्होंने जल्द ही सर्वसम्मत राजनीतिक समाधान नहीं निकाला, तो बांग्लादेश एक बार फिर सेना के साए में चला जाएगा — और लोकतंत्र का सपना अधूरा रह जाएगा.
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