भारत के बायकॉट से मालदीव जैसा हो जाएगा तुर्की का हाल! पर्यटकों के ना जाने से कितने का होगा नुकसान?

भारत के बायकॉट से मालदीव जैसा हो जाएगा तुर्की का हाल! पर्यटकों के ना जाने से कितने का होगा नुकसान?

नई दिल्लीः जब एक देश के नागरिक केवल वोटिंग बूथ ही नहीं, बल्कि ट्रैवल बुकिंग और मार्केट चॉइस से भी वैश्विक संबंधों की दिशा तय करने लगें—तो समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब केवल कूटनीतिक दायरे तक सीमित नहीं रही। भारत और तुर्की के बीच हालिया तनाव इस बदलते परिदृश्य का सजीव उदाहरण बन रहा है। पाकिस्तान को समर्थन देने वाले बयानों और तुर्की की मीडिया में फैलाए गए भारत-विरोधी प्रोपेगेंडा के बाद, भारत के आम नागरिकों में नाराजगी उफान पर है, और इसका असर सीधे-सीधे तुर्की के आर्थिक हितों पर पड़ रहा है।

क्या तुर्की भी मालदीव की राह पर?

मालदीव को भारतीय पर्यटकों के बहिष्कार से जो नुकसान झेलना पड़ा था, वह अब तुर्की के सामने चेतावनी की तरह खड़ा है। फर्क बस इतना है कि जहां मालदीव एक छोटा द्वीपीय राष्ट्र था, वहीं तुर्की एक बड़ी और विविध अर्थव्यवस्था है। लेकिन सवाल यह है कि क्या तुर्की भारत के शक्तिशाली पर्यटन और व्यापारिक नेटवर्क की अनदेखी झेल पाएगा?

भारतीय पर्यटक: अब सिर्फ संख्या नहीं, एक प्रभावशाली शक्ति

भारत अब “बजट ट्रैवलर” की छवि से बाहर निकल चुका है। 2023 में भारतीय पर्यटकों ने अंतरराष्ट्रीय यात्राओं पर 18 अरब डॉलर से अधिक खर्च किया—यह आंकड़ा दुनिया के कई देशों की टूरिज़्म इंडस्ट्री की रीढ़ है। ऐसे में भारतीय पर्यटकों की नाराजगी किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को हिला सकती है।

तुर्की के लिए खतरे की घंटी

साल 2023 में करीब 2.74 लाख भारतीय पर्यटक तुर्की गए थे, और 2024 में यह आंकड़ा 3.5 लाख तक पहुंच गया। अनुमान लगाया गया था कि 2025 तक भारत से आने वाले टूरिज्म से तुर्की को लगभग 300 मिलियन डॉलर की आमदनी होगी। लेकिन अब ट्रैवल कंपनियों द्वारा बुकिंग रद्द करने और पैकेज हटाने के बाद यह उम्मीद गंभीर संकट में है।

यदि मौजूदा स्थिति बनी रही, तो अनुमान है कि तुर्की को टूरिज्म सेक्टर में 150–200 मिलियन डॉलर तक का सीधा घाटा झेलना पड़ सकता है।

डेस्टिनेशन वेडिंग्स: जहां भावनाएं और अर्थशास्त्र मिलते हैं

तुर्की भारतीय डेस्टिनेशन वेडिंग्स का नया पसंदीदा स्थल बन चुका था। हर साल 50 से ज्यादा भव्य भारतीय शादियां इंस्तांबुल, बोडरम और कपाडोसिया जैसे शहरों में होती थीं। एक औसत शादी पर 5 से 15 करोड़ रुपये तक खर्च किया जाता है। इसका फायदा तुर्की के होटल, ट्रांसपोर्ट, इवेंट मैनेजमेंट, और स्थानीय सेवा उद्योगों को होता था।

अब इस क्षेत्र में भी बड़ा झटका लगने की आशंका है। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि यदि भारतीय परिवारों ने तुर्की को वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में बहिष्कृत किया, तो करीब 1000 करोड़ रुपये तक का नुकसान तय है।

व्यापारिक संबंधों पर भी छाया असर

सिर्फ पर्यटन ही नहीं, तुर्की से आयात होने वाले उत्पादों पर भी असर दिखने लगा है। तुर्की के सेब अब भारतीय बाजारों से गायब हैं। व्यापारियों ने इनके विकल्प के रूप में अमेरिका, न्यूजीलैंड और ईरान से आयात शुरू कर दिया है।

सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार अब तुर्की से दालों, तिलहन और स्टील जैसे उत्पादों के व्यापार पर पुनर्विचार कर रही है। यह ऐसे संकेत हैं जो भविष्य में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को नए सिरे से परिभाषित कर सकते हैं।

सिर्फ आर्थिक नहीं, यह है कूटनीतिक संदेश

भारत ने इससे पहले मालदीव के मामले में दिखाया था कि जब आम नागरिक संगठित होकर विरोध करते हैं, तो उसका असर विदेश नीति तक पहुंचता है। अब तुर्की उसी मोड़ पर खड़ा है। फर्क केवल पैमानों का है—भावना वही है।

भारत यह स्पष्ट संदेश दे रहा है:
“जो देश आतंकवाद और प्रोपेगेंडा का समर्थन करेंगे, उनके साथ आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग संभव नहीं है।”

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  • Aaj Ki Baat Desk

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